Jharkhand: सरायकेला के छऊ मुखौटा शिल्पकार गुरु सुशांत महापात्र राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित

सरायकेला । सरायकेला की वैश्विक पहचान बन चुकी छऊ कला और पारंपरिक मुखौटा शिल्प को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च सम्मान मिला है । नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सरायकेला के प्रसिद्ध छऊ मुखौटा शिल्पकार और गुरु सुशांत कुमार महापात्र को प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया । वर्ष 2024 और 2025 के लिए आयोजित इस समारोह में देशभर के 115 शीर्ष कलाकारों को फेलोशिप और राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए गए ।

प्रधानमंत्री मोदी को भेंट किया था कृष्ण मुखौटा

गुरु सुशांत महापात्र की कला की धमक देश के शीर्ष नेतृत्व तक है । वर्ष 2019 में उनके द्वारा विशेष रूप से तैयार किया गया भगवान श्रीकृष्ण का मुखौटा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भेंट किया गया था । सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में इन मुखौटों का विशेष महत्व है । यहां तैयार होने वाले मुखौटे अपनी बारीक कारीगरी, रंगों के अनोखे संयोजन और पारंपरिक तकनीक के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं ।

सियोल ओलंपिक से लेकर अमेरिका-जर्मनी तक बिखेरी चमक

गुरु सुशांत महापात्र ने सरायकेला की कला को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया है । संगीत नाटक अकादमी के विशेष अनुरोध पर उन्होंने दक्षिण कोरिया के सियोल ओलंपिक के लिए भगवान श्रीकृष्ण और श्रीगणेश के भव्य मुखौटे तैयार किए थे । इसके अलावा, वर्ष 1996 में उन्होंने अमेरिका के न्यूयॉर्क, जर्मनी के बर्लिन और ऑस्ट्रिया के वियना में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं में हिस्सा लेकर वैश्विक मंच पर झारखंड की कला का लोहा मनवाया ।

कई बड़े पुरस्कारों से हो चुके हैं सम्मानित

गुरु सुशांत महापात्र को मिला यह संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार उनके जीवन की पहली उपलब्धि नहीं है । इससे पहले भी उन्हें कई बड़े सम्मानों से नवाजा जा चुका है, जिनमें मुख्य रूप से सिंहभूम शिल्प सम्मान, राज्य सांस्कृतिक सम्मान, छऊ गुरु सम्मान, श्रेष्ठ मुखौटा निर्माता सम्मान, कला श्री सम्मान शामिल है ।10 दिसंबर 1952 को जन्मे गुरु सुशांत कुमार महापात्र को यह अद्भुत शिल्पकला विरासत में मिली है । करीब एक सदी पहले उनके बड़े पिताजी गुरु प्रसन्न कुमार महापात्र ने सरायकेला शैली के छऊ नृत्य में आधुनिक मुखौटा निर्माण की परंपरा शुरू की थी। इसी को आगे बढ़ाते हुए सुशांत महापात्र ने महज 8 साल की उम्र से मुखौटा बनाना सीखा। वर्ष 1972 से वह लगातार इस कला को सींच रहे हैं। अब यह अनमोल विरासत उनकी तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है। उनके पुत्र सुमित महापात्र भी इस पारंपरिक काम से पूरी तरह जुड़े हुए हैं।

कला का संरक्षण ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य

राष्ट्रीय पुरस्कार ग्रहण करने के बाद गुरु सुशांत महापात्र ने इस सम्मान को अपने गुरुओं को समर्पित किया। उन्होंने भावुक होकर कहा, “सरायकेला की छऊ मुखौटा कला को आगे बढ़ाना ही मेरे जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है। मैं आगे भी इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए काम करता रहूंगा । यह सम्मान सिर्फ उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि सरायकेला की सदियों पुरानी छऊ परंपरा, मुखौटा शिल्प और कलाकारों की कई पीढ़ियों की मेहनत का सम्मान है । राष्ट्रपति के हाथों मिला यह पुरस्कार निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों को भी इस कला से जोड़ने का काम करेगा ।

Exit mobile version