Maharashtra INFACTNews

Maharasthra: “जवाबदेही मांगना गुनाह नहीं”: युवाओं को ‘कॉकरोच’ कहने पर भड़कीं प्रियंका चतुर्वेदी, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर छिड़ा विवाद

महाराष्ट्र :दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सीनियर एडवोकेट का दर्जा देने के नियमों में कथित देरी को लेकर दायर एक अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ की टिप्पणी पर विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले में विपक्षी नेताओं ने न्यायपालिका की कार्यशैली और आलोचना के प्रति असहिष्णुता पर सवाल उठाए हैं।

प्रियंका चतुर्वेदी का पलटवार: “आलोचना सहने की क्षमता नहीं

शिव सेना नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए न्यायपालिका की जवाबदेही पर बात की। उन्होंने लिखा “अगर 3 साल से ज्यादा का इंतजार करने के बाद भी किसी ऐसे मुद्दे पर फैसला नहीं आता, जिसका संवैधानिक असर है और जो लोकतंत्र को कमजोर करता है, तो क्या यह बात आलोचना या नाराजगी जाहिर करने लायक नहीं है? न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करने वाले युवाओं और कार्यकर्ताओं को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहना साबित करता है कि हमारी न्यायपालिका में सीधे-सीधे आलोचना का सामना करने की क्षमता नहीं है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।”

किस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दिया बयान?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के वकील संजय दुबे द्वारा दायर एक अवमानना याचिका पर सुनवाई चल रही थी। याचिका में शिकायत की गई थी कि दिल्ली हाई कोर्ट ने वरिष्ठ वकीलों को मान्यता देने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए दिशानिर्देशों को लागू करने में अत्यधिक देरी की । शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ कर रही थी।

बेंच की वह टिप्पणी जिसपर मचा है बवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता के रुख पर असंतोष जताते हुए सोशल मीडिया और आरटीआई कार्यकर्ताओं के काम करने के तरीके पर तीखी टिप्पणी की। बेंच ने कहा “कुछ युवा कॉकरोच की तरह हैं, जिन्हें न तो कोई रोजगार मिलता है और न ही किसी पेशे में कोई स्थान। उनमें से कुछ मीडिया में चले जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता या अन्य तरह के कार्यकर्ता बन जाते हैं, और फिर वे हर किसी पर (संस्थानों पर) हमला करना शुरू कर देते हैं।”

सोशल मीडिया पर कानूनी और सामाजिक बहस तेज

इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और कानूनी बिरादरी में दो स्पष्ट धड़े बन गए हैं।आलोचकों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं का कहना है कि देश के युवाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों (जैसे आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का इशारा उन लोगों की तरफ था जो बिना तथ्यों के केवल दबाव बनाने या अदालतों की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से सोशल मीडिया और याचिकाओं का दुरुपयोग करते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button