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Bengal: चुनाव ड्यूटी से प्रोफेसरों को मिली राहत, हाईकोर्ट ने कहा ‘अधिकारियों की नियुक्ति की शक्ति असीमित नहीं’

कोलकाता : पश्चिम बंगाल में चुनावी सरगर्मियों के बीच कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को एक बड़ा झटका दिया है। जस्टिस कृष्णा राव की पीठ ने सरकारी कॉलेजों के असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसरों को पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त करने वाली अधिसूचना को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों और प्रोफेसरों को इस तरह की ड्यूटी पर बिना किसी ठोस कारण के नहीं लगाया जा सकता।

“जजों को भी ड्यूटी पर लगा दो” – हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने चुनाव आयोग द्वारा दिशा-निर्देशों में बार-बार किए जा रहे बदलावों पर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने तंज कसते हुए कहा “आप जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 26 के तहत जजों को भी मतदान अधिकारी बना सकते हैं। मैं खुद जाने के लिए तैयार हूँ। यह कोई मजाक नहीं है। आप हर बार अपने दिशानिर्देश बदलते हैं, लेकिन कोई पारदर्शी अधिसूचना जारी नहीं करते।”

क्या था विवाद?

याचिकाकर्ताओं (प्रोफेसरों) का तर्क था कि ‘ग्रुप-ए’ के अधिकारियों और टीचिंग स्टाफ को चुनाव ड्यूटी पर तभी लगाया जा सकता है जब कोई ‘अपरिहार्य परिस्थिति’ हो और उसका लिखित कारण दर्ज किया गया हो।वरिष्ठ अधिवक्ता बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने कोर्ट को बताया कि आयोग ने टाइपिस्ट और स्टेनोग्राफर जैसे कर्मचारियों को ‘सेक्टर अधिकारी’ (उच्च पद) बनाया, जबकि प्रोफेसरों को उनसे नीचे ‘पीठासीन अधिकारी’ की जिम्मेदारी दे दी।कोर्ट ने आयोग को वह रिकॉर्ड पेश करने के लिए तीन दिन का समय दिया था जिसमें इन नियुक्तियों के पीछे के ‘अपरिहार्य कारण’ दर्ज हों, लेकिन आयोग ऐसा कोई भी दस्तावेज पेश नहीं कर सका।

चुनाव आयोग का तर्क

आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सौम्य मजूमदार ने दलील दी कि राज्य में 90,000 बूथों पर चुनाव होने हैं, इतने बड़े स्तर पर वेतनमान और पद का कड़ाई से पालन करना हमेशा संभव नहीं होता।उन्होंने दावा किया कि याचिका देर से दायर की गई है और यह केवल ड्यूटी से बचने की एक कोशिश है।

कोर्ट के आदेश के मुख्य अंश

अदालत ने अपने 11 पन्नों के आदेश में स्पष्ट किया कि प्रोफेसरों को पीठासीन अधिकारी बनाने की वर्तमान नियुक्तियां रद्द की जाती हैं। यह आदेश उन प्रोफेसरों पर लागू नहीं होगा जो पहले ही ट्रेनिंग ले चुके हैं और अपनी मर्जी से ड्यूटी करना चाहते हैं। चुनाव आयोग अभी भी इन प्रोफेसरों को उनके पद और गरिमा के अनुरूप नई चुनावी जिम्मेदारियां सौंपने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते वह नियमों का पालन करे।हाईकोर्ट के इस फैसले से चुनाव आयोग को अब नए सिरे से मतदान अधिकारियों की सूची तैयार करनी होगी। हालांकि, जानकारों का मानना है कि ‘रिजर्व पूल’ में पर्याप्त कर्मचारी होने के कारण इससे चुनाव की तारीखों या प्रक्रिया पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन यह फैसला प्रशासनिक नियुक्तियों में पारदर्शिता की जीत माना जा रहा है।

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