Jharkhand: “झारखंड भगवान का लाडला बेटा, इसे पानीदार बनाना है”— जमशेदपुर सम्मेलन में बोले जलपुरुष राजेंद्र सिंह

जमशेदपुर: साकची स्थित मोती लाल नेहरू पब्लिक स्कूल के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित राष्ट्रीय नदी एवं पर्वत सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए देश के विख्यात ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह (मैग्सेसे पुरस्कार विजेता, 2001) ने झारखंड की प्राकृतिक संपदा की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा, “झारखंड भगवान का लाडला बेटा है। यहां खूबसूरत झाड़ियां हैं, समृद्ध नदियां हैं और ऊंचे पर्वत हैं। हमारा लक्ष्य इसे पूरी तरह ‘पानीदार’ (जल समृद्ध) बनाना है। अगर इच्छाशक्ति हो, तो यहां के गंदे नालों को भी दोबारा स्वच्छ नदी में बदलना असंभव नहीं है।”राजेंद्र सिंह ने घोषणा की कि पर्वतों और नदियों को कानूनी सुरक्षा देने के लिए एक प्रारंभिक ड्राफ्ट बिल तैयार कर लिया गया है, जिसे कानून की शक्ल देने के लिए देश की यह पहली राष्ट्रीय बैठक जमशेदपुर में आयोजित की गई है।

“जब राजस्थान की नदियां जीवित हो सकती हैं, तो देश की क्यों नहीं?”

जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने देश की व्यवस्था और नीति निर्धारकों पर सवाल उठाते हुए अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा, “जब हमने अपने 51 वर्षों के प्रयासों से राजस्थान जैसे मरुस्थलीय राज्य में लुप्त हो चुकी कई नदियों को पुनर्जीवित कर दिया और 15,000 से अधिक जल संचयन बांध बनवाए, तो फिर पूरे देश में पर्वतों और नदियों को क्यों नहीं बचाया जा सकता?”उन्होंने इस बात पर गहरा दुख जताया कि आजादी के इतने दशकों बाद भी आज तक देश में ‘पर्वत संरक्षण’ को लेकर कोई स्वतंत्र और कड़ा कानून नहीं बन सका है, जिसके कारण भू-माफिया धड़ल्ले से पहाड़ों को लील रहे हैं।

“कानून का ड्राफ्ट तैयार, जल्द दिखेंगे सकारात्मक परिणाम”— जस्टिस वी. गोपाला गौड़ा

सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति वी. गोपाला गौड़ा ने देश के पर्यावरणविदों को आश्वस्त करते हुए कानून के वैधानिक पहलुओं पर अपनी बात रखी। जस्टिस गौड़ा ने कहा, “पर्वत और नदियों को बचाने के लिए बनाए जाने वाले विशेष कानून का ड्राफ्ट बिल हमारे पास (न्यायिक विमर्श में) आ चुका है। हम देश को आश्वस्त करते हैं कि इस सम्मेलन के मंथन के बाद बहुत जल्द इसके सकारात्मक और ऐतिहासिक परिणाम सामने आएंगे।”

वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की दोटूक: “प्रकृति का दोहन हो, शोषण नहीं”

सम्मेलन में ड्राफ्ट को तैयार करने वाले विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने अपनी वैज्ञानिक और ऐतिहासिक केस-स्टडीज पेश कीं। नदियों पर कानून का वैज्ञानिक खाका तैयार कर रहे आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के प्रोफेसर अंशुमाली ने बताया कि पहाड़ों और नदियों के नष्ट होने से पारिस्थितिकी को होने वाले नुकसान के वैज्ञानिक महत्व को इस ड्राफ्ट में शामिल किया गया है। बिहार व झारखंड की नदियों के विशेषज्ञ दिनेश मिश्रा ने मानगो के इतिहास को याद करते हुए कहा, “वर्ष 1978 में मानगो में बने पुराने पुल के ऊपर से बाढ़ का पानी बह रहा था, लेकिन आज जलस्रोतों के अतिक्रमण के कारण स्थिति पूरी तरह बदल गई है। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति का सकारात्मक तरीके से दोहन (यूज़) होना चाहिए, शोषण (बर्बादी) नहीं।”

“वन विभाग पहाड़ और सिंचाई विभाग संभालता है पानी, पर गंभीरता गायब”— सरयू राय

सम्मेलन के संरक्षक, प्रख्यात पर्यावरणविद् और स्थानीय विधायक सरयू राय ने सरकारी महकमों के ढुलमुल रवैये और तालमेल की कमी पर सीधा प्रहार किया। सरयू राय ने कहा, “मौजूदा व्यवस्था में वन विभाग के जिम्मे पहाड़ हैं और सिंचाई विभाग नदियों के पानी को नियंत्रित करता है, लेकिन दोनों विभागों ने कभी भी इनके संरक्षण पर एक साथ गंभीरता से नहीं सोचा।”उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि झारखंड के नक्शे से कई छोटे-बड़े पहाड़ खनन के कारण पूरी तरह गायब हो चुके हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि नौकरशाही पर निर्भर रहने के बजाय एक कड़ा केंद्रीय और राज्य स्तरीय कानून बनाकर इस विनाश को रोका जाए।

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