प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक पति द्वारा भरण-पोषण राशि के खिलाफ दायर की गई याचिका को खारिज करते हुए पुरुष की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी को रेखांकित किया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने कहा कि शादी के बाद पत्नी का भरण-पोषण करना पति की कानूनी बाध्यता है।
“भरण-पोषण करना पति की कानूनी बाध्यता है”
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पुरुषों की जिम्मेदारी पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा “जो पुरुष यह महसूस करते हैं कि यदि शादीशुदा जिंदगी में खटास आ जाए तो वे पत्नी और बच्चों का खर्च नहीं उठा पाएंगे, उन्हें शुरुआत में शादी ही नहीं करनी चाहिए।”अदालत ने स्पष्ट किया कि खराब आर्थिक स्थिति का बहाना बनाकर कोई भी व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला पति तेज बहादुर द्वारा दायर एक अपील से जुड़ा था, जिसमें उसने प्रयागराज फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज ने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 24 के तहत पत्नी को मुकदमा लंबित रहने तक 4,000 रुपये प्रति माह मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया था। पति के वकील ने दलील दी कि उसकी आर्थिक स्थिति खराब है और ट्रायल कोर्ट ने इस पहलू पर ध्यान नहीं दिया। पत्नी ने अदालत को बताया कि वह अधिक शिक्षित नहीं है, उसके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और वह अकेले ही बच्चों का पालन-पोषण कर रही है।
हाई कोर्ट का फैसला: 4,000 रुपये ज्यादा नहीं
मामले के सभी तथ्यों को देखने के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट का फैसला बिल्कुल सही था। कोर्ट ने कहा कि आज के महंगाई के समय में जीवन जीने के लिए 4,000 रुपये की राशि न तो बहुत ज्यादा है और न ही यह पति की वहन क्षमता से बाहर मानी जा सकती है। अदालत ने दोहराया कि एक बार विवाह हो जाने के बाद, कानून के तहत पति अपनी पत्नी का गुजारा करने के लिए बाध्य है।
