रांची। झारखंड में दो राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने राज्य की सियासत में भारी उबाल ला दिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर शुक्रवार को हुई झारखंड मुक्ति मोर्चा की एक हाई-प्रोफाइल बैठक में बेहद चौंकाने वाला फैसला लिया गया है। झामुमो ने ऐलान किया है कि पार्टी दोनों ही सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगी। इस फैसले के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन (जेएमएम -कांग्रेस) के भीतर दरार आने की सुगबुगाहट तेज हो गई है।
कांग्रेस की घोषणा के ठीक दूसरे दिन जेएमएम का पलटवार
दरअसल, झारखंड में दो राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं। गठबंधन में शामिल कांग्रेस और झामुमो दोनों ही इन सीटों पर अपना-अपना दावा ठोक रहे थे। विवाद के बीच, एक दिन पहले ही कांग्रेस ने दिल्ली से अपने सीनियर लीडर प्रणव झा को झारखंड से राज्यसभा का उम्मीदवार घोषित कर दिया था।कांग्रेस की इस एकतरफा घोषणा के ठीक दूसरे दिन मुख्यमंत्री आवास पर झामुमो की बड़ी बैठक हुई। इस बैठक में सीएम हेमंत सोरेन, मंत्री हफीजुल हसन, दीपक बिरुआ, स्टीफन मरांडी, नलिन सोरेन और बसंत सोरेन समेत पार्टी के कई दिग्गज नेता शामिल हुए।
“दोनों सीटों पर हमारा हक, सीएम लेंगे अंतिम फैसला” – हफीजुल हसन
बैठक के बाद सूबे के मंत्री हफीजुल हसन ने मीडिया को संबोधित करते हुए झामुमो की रणनीति साफ कर दी। उन्होंने कहा “बैठक में राज्यसभा चुनाव को लेकर गंभीर रणनीति बनी है। पार्टी ने सर्वसम्मति से फैसला लिया है कि दोनों सीटों पर झामुमो का ही उम्मीदवार होगा। हालांकि, उम्मीदवारों के नामों के चयन पर अंतिम और सर्वोच्च फैसला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लेंगे।”
क्या हैं राज्यसभा चुनाव के समीकरण? (सियासी आंकड़े)
झारखंड विधानसभा के मौजूदा गणित और आंकड़ों को देखें तो इस फैसले ने दूसरी सीट पर सस्पेंस बढ़ा दिया है। झारखंड में राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 28 विधायकों के प्रथम वरीयता के वोट की आवश्यकता होती है। दोनों सीटों पर क्लीन स्वीप करने के लिए गठबंधन को पूरे 56 विधायकों के एकजुट समर्थन की जरूरत होगी।अपने बूते झामुमो एक सीट बेहद आसानी से जीत रही है। दूसरी सीट जीतने के लिए झामुमो को कांग्रेस और सहयोगियों के पूरे समर्थन की जरूरत पड़ेगी। लेकिन चूंकि कांग्रेस ने पहले ही प्रणव झा के नाम का ऐलान कर दिया है, ऐसे में झामुमो का दोनों सीटों पर दावा करना गठबंधन के भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
क्या दो-फाड़ होगा गठबंधन?
मंत्री हफीजुल हसन के इस बयान के बाद झारखंड के सियासी गलियारों में कड़ाके की तपिश बढ़ गई है। अब सभी की निगाहें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि क्या यह झामुमो की ओर से कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति है, या फिर इस बार राज्यसभा चुनाव में जेएमएम और कांग्रेस एक-दूसरे के आमने-सामने दो-फाड़ नजर आएंगी?
