
प्रयागराज : इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12वीं कक्षा की दो छात्राओं के खिलाफ दर्ज उस प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार कर दिया है, जिसमें उन पर अपनी सहपाठी को इस्लाम धर्म अपनाने, बुर्का पहनने और मांस खाने के लिए विवश करने का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि युवाओं में अपना धर्म दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति बेहद चिंताजनक है।
“दूसरों पर विश्वास थोपना चिंताजनक” – हाईकोर्ट
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए ‘उप्र विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021’ के महत्व पर प्रकाश डाला।कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम समाज में ऐसी स्थितियों को रोकने के लिए बनाया गया है जहाँ लोग धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि उसे दूसरों पर थोपते हैं। अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि यह युवाओं के जीवन का वह समय है जब उन्हें अपने कौशल विकास और राष्ट्र सेवा पर ध्यान देना चाहिए। यदि इस तरह के रुझान को शुरुआती चरण में नहीं रोका गया, तो कानून का उद्देश्य विफल हो जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की गहन जांच जरूरी है और इसे शुरू में ही समाप्त नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मुरादाबाद जिले का है, जहाँ 12वीं की एक छात्रा के भाई ने शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि अलीना और शाबिया सहित पांच छात्राओं ने पीड़िता को ट्यूशन सेंटर पर इस्लाम स्वीकार करने और बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया। पीड़िता ने उल्लेख किया कि दिसंबर 2025 में आरोपियों ने उसे जबरन बुर्का पहनाया और मांसाहारी भोजन करने के लिए प्रलोभन दिया। केस डायरी के अनुसार, एक गली में लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज में पीड़िता को आरोपी छात्राओं द्वारा बुर्का पहनने के लिए मजबूर करते हुए देखा गया है।
याचिकाकर्ताओं की दलील और कोर्ट का फैसला
आरोपी छात्राओं के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं को 12वीं की परीक्षा देनी है और प्राथमिकी के कारण वे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रही हैं। हालांकि, अदालत ने 11 पन्नों के अपने निर्णय में कहा कि केस डायरी में मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया मामले की गंभीरता को दर्शाती है। साक्ष्यों और परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने प्राथमिकी रद्द करने की मांग वाली याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।



