भोपाल: उर्दू शायरी को आम आदमी की जुबान देने वाले और गजल विधा में नए प्रयोग करने वाले महान शायर डॉ. बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने गुरुवार को अपने भोपाल स्थित निवास पर अंतिम सांस ली। साहित्य में उनके योगदान के लिए भारत सरकार उन्हें पद्मश्री से सम्मानित कर चुकी है।बशीर बद्र न केवल एक शायर थे, बल्कि उन्होंने उर्दू भाषा को कई ठेठ और आसान शब्दों से समृद्ध किया, जिससे उनकी गजलें सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचीं।
अयोध्या से अलीगढ़ और फिर शायरी की दुनिया में धाक
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने एएमयू में उर्दू के प्रोफेसर के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। 12 अगस्त 1974 को उन्होंने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर ज्वाइन किया था।
1987 के मेरठ दंगे और भोपाल का सफर
बशीर बद्र के जीवन में 1987 का वर्ष एक गहरा घाव देकर गया। मेरठ के सांप्रदायिक दंगों के दौरान उनका घर जला दिया गया था। इस आगजनी में उनकी कई ऐतिहासिक और बेशकीमती रचनाएं, कविताएं और पांडुलिपियां हमेशा के लिए राख हो गईं। इस दर्दनाक घटना के बाद उन्होंने मेरठ छोड़ दिया और हमेशा के लिए भोपाल में शिफ्ट हो गए। हालांकि, अपनी बीमारी के चलते पिछले कई वर्षों से उन्होंने शायरी की दुनिया से दूरी बना ली थी।
सम्मान और पुरस्कार: ‘जोश-ए-उर्दू’ से पद्मश्री तक
बशीर बद्र को उनके जीवनकाल में कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया। भारत सरकार द्वारा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें यह उच्च नागरिक सम्मान दिया गया।दुबई की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था ‘बज्म-ए-उर्दू’ ने 2018 में उनके घर पहुंचकर उन्हें इस सम्मान से नवाजा था। उन्हें चांदी की हैंडमेड शील्ड और शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया था।
गजल विधा में उनका योगदान
बशीर बद्र को ‘आसान जुबान’ की शायरी का उस्ताद माना जाता था। उन्होंने गजल में कई ऐसे शब्द शामिल किए जो पहले उर्दू शायरी का हिस्सा नहीं समझे जाते थे। उनकी गजलों में एक नयापन और आधुनिकता थी, जो युवाओं और प्रबुद्ध वर्ग दोनों को समान रूप से आकर्षित करती थी।’उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो’, ‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे’ और ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से’ जैसे उनके अनगिनत शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं।उनके निधन पर साहित्यकारों ने कहा है कि बशीर बद्र के जाने से उर्दू गजल के उस सुनहरे दौर का अंत हो गया है जिसने शायरी को महफिलों से निकालकर आम आदमी की दहलीज तक पहुंचाया था।
