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Madhya Pradesh: ग्वालियर के कृषि वैज्ञानिकों ने कर दिखाया कमाल, बिना मिट्टी के तैयार किए 20 किस्मों के बीज

ग्वालियर : ग्वालियर के राजमाता विजया राजे सिंधिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कमाल कर दिया है। इन वैज्ञानिकों ने बिना मिट्टी के हवा में आलू उगाए हैं। ये आलू विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग की एरोपोनिक्स लैब यूनिट में तैयार किए गए हैं। लैब में मिट्टी के बिना केवल फॉगिंग और पोषक तत्वों की मदद से करीब 20 अलग-अलग किस्मों के आलू के बीज तैयार किए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि ये बीज कई बीमारियों से मुक्त हैं।

मिट्टी में नहीं लगाए जाते हैं पौधे

राजमाता विजया राजे कृषि विश्वविद्यालय में जैव प्रौद्योगिकी विभाग की वैज्ञानिक और एयरोपोनिक प्रोजेक्ट की इंचार्ज डॉक्टर सुषमा तिवारी ने बताया कि एयरोपोनिक तकनीक में पौधे टिशू कल्चर के माध्यम से लैब में तैयार किए जाते हैं। फिर ये पौधे मिट्टी में नहीं लगाए जाते हैं। जब पौधे एयरोपोनिक यूनिट में ट्रांसप्लांट करने होते हैं तब एक महीने पहले इनकी हार्डनिंग की जाती है। इन पौधों की जड़ें हवा में लटकी रहती हैं।

पोषण के लिए फॉगिंग सिस्टम का इस्तेमाल

डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि पौधे की जड़ वाले वाले हिस्से को थोड़ा काट दिया जाता है। इसके बाद मिस्ट या फॉगिंग के जरिए लगातार नमी बनाए रखी जाती है। साथ ही पोषक भी फॉगिंग तकनीक से ही दिए जाते हैं। इन पौधों की जड़ों में आलू के बल्ब बनने तक पूरा पोषण फॉगिंग सिस्टम के जरिए ही किया जाता है। इस तकनीक से उच्च गुणवत्ता वाले आलू के बीज यानी मिनी ट्यूबर बनते हैं।

खूबियां बेमिसाल, बीमारी फ्री होते हैं ये आलू

डॉक्टर सुषमा तिवारी ने बताया कि हवा में तैयार किए जाने वाले आलू रोग मुक्त होते हैं। देखा जाता है कि मिट्टी के भीतर उगे आलू की फसल पर रोग या वायरस का असर पड़ता हैं लेकिन इस तकनीक से तैयार आलू के बीजों की फसल में ऐसी कोई बीमारी नहीं होती है। एरोपोनिक में तैयार पौधे बीमारी फ्री होते हैं। ये हेल्दी पौधे होते हैं। ये आलू के बीच अच्छी गुणवत्ता के होते हैं। यही नहीं इन बीजों से उत्पादन भी कई गुना अधिक होता है।

एक किलो मिनी ट्यूबर से 4 क्विंटल पैदावार

डॉक्टर सुषमा तिवारी ने बताया कि एयरोपोनिक तकनीक से उगाए बीज का वजन बेहद कम होता है। इन्हें हम मिनी ट्यूबर का नाम देते हैं। इन मिनी ट्यूबर का वजन 2 से 3 ग्राम तक ही होता है। दो साल पहले जब इसकी शुरुआत के समय प्रदर्शनी यूनिट लगाई गई थी तब एक किलोग्राम बीज पैदा हुए थे। इससे 400 किलोग्राम सामान्य आलू निकला था। हालांकि किसानों को उक्त आलू के बीज जी-2 प्रोसेस के बाद ही दिए जाते हैं।

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