National: देशव्यापी एलपीजी संकट का धार्मिक स्थलों पर बड़ा असर, कई बड़े मंदिरों में ‘अन्नप्रसादम’ बंद

नई दिल्ली : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण देश में रसोई गैस की किल्लत अब श्रद्धालुओं की थाली तक पहुंच गई है। पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक, भारत के कई प्रतिष्ठित मंदिरों की रसोइयों में गैस की कमी के कारण ताले लटकने लगे हैं। लाखों श्रद्धालुओं को मिलने वाला निशुल्क प्रसाद या तो कम कर दिया गया है या अस्थायी रूप से बंद हो गया है।

बेंगलुरु: बनशंकरी मंदिर में 11 मार्च से प्रसाद वितरण ठप

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के प्रसिद्ध बानाशंकरी मंदिर में गैस की भारी कमी के कारण 11 मार्च से ‘अन्नप्रसादम’ की सेवा रोक दी गई है।मंदिर को प्रतिदिन 5 से 6 कमर्शियल सिलेंडरों की जरूरत होती है, जबकि स्टॉक में केवल 4 ही बचे हैं। मंदिर के इस फैसले से हजारों श्रद्धालु दुखी हैं। लोगों ने मांग की है कि सरकार को धार्मिक स्थलों के लिए सिलेंडर की आपूर्ति प्राथमिकता के आधार पर करनी चाहिए।

शिरडी: ‘साईं प्रसादालय’ में 20 दिन का एडवांस स्टॉक

शिरडी स्थित साईं बाबा संस्थान ने दूरदर्शिता दिखाते हुए संकट गहराने से पहले ही तैयारी कर ली थी।संस्थान के पास वर्तमान में लगभग 20 टन गैस उपलब्ध है, जो अगले 20 दिनों के लिए पर्याप्त है।शिरडी में सौर ऊर्जा परियोजना का व्यापक उपयोग हो रहा है। इससे दाल और चावल पकाने में प्रतिदिन 200 किलो गैस की बचत हो रही है, जिससे गैस पर निर्भरता कम हुई है।

पंढरपुर: युद्ध जैसी स्थिति के लिए ‘प्लान-बी’ तैयार

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध श्री विट्ठल रुक्मिणी मंदिर प्रशासन ने गैस एजेंसियों के साथ बैठक कर संकट से निपटने की रणनीति बनाई है। मंदिर समिति के कार्यकारी अधिकारी राजेंद्र शेल्के के अनुसार, यदि गैस आपूर्ति पूरी तरह ठप होती है, तो पारंपरिक चूल्हों और डीजल जाली पर भोजन तैयार किया जाएगा ताकि कोई श्रद्धालु भूखा न रहे।

कोल्हापुर: अंबाबाई मंदिर क्षेत्र में संकट गहराया

कोल्हापुर जिला प्रशासन द्वारा कमर्शियल गैस की आपूर्ति बंद किए जाने का सबसे बुरा असर अंबाबाई मंदिर के पास स्थित खाद्य स्टॉलों पर पड़ा है। अधिकांश स्टॉल संचालकों के पास आज तक का ही स्टॉक बचा है। कल से दर्शनार्थियों को जलपान और भोजन के लिए भटकना पड़ सकता है।

श्रद्धालुओं की मांग

देश के प्रमुख मंदिरों में प्रसाद वितरण केवल भोजन नहीं, बल्कि एक अटूट परंपरा है। कई मंदिरों में अब प्रसाद के रूप में पका हुआ भोजन देने के बजाय केवल फल वितरित किए जा रहे हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि सरकार को मंदिरों की ‘अन्न सेवा’ को आपातकालीन श्रेणी में रखना चाहिए।

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